महिषासुर: बहुजन समाज का शहीद नायक
परिचय: भारत के इतिहास में कई घटनाएँ अलग-अलग दृष्टिकोण से देखी गई हैं। ब्राह्मणवादी विचारधारा महिषासुर को “राक्षस” बताती है, लेकिन बहुजन, दलित और जनजातीय समाज उन्हें एक जननायक और शहीद का दर्जा देता है। महिषासुर की स्मृति आज बहुजन आत्मसम्मान की पहचान बन गई है।
असुर असल में कौन थे?
‘असुर’ इस भूमि के मूलनिवासी थे — खेती-किसानी और सामूहिक जीवन जीने वाले लोग। आर्यों के आगमन के बाद इन्हें “राक्षस” और “दानव” कहा गया, जिससे इनकी पहचान को नीचा दिखाया गया।
महिषासुर का संघर्ष
महिषासुर ने देवताओं के अन्यायपूर्ण नियंत्रण का विरोध किया। उनका संघर्ष बहुजन समाज के सम्मान, अधिकार और आत्मसम्मान की रक्षा का प्रतीक बन गया।
विजेता का लेखन
इतिहास हमेशा विजेताओं द्वारा लिखा गया। इसलिए धार्मिक ग्रंथों में महिषासुर को “बुरा” और दुर्गा को “रक्षक” कहा गया। लेकिन असल में यह संघर्ष शासक वर्ग और मूलनिवासी समाज के बीच का था।
महिषासुरोत्सव दिवस
आज दलित, पिछड़ा और आदिवासी समाज महिषासुर शहादत दिवस मनाता है। यह आयोजन सिर्फ़ धार्मिक नहीं बल्कि अपनी अस्मिता और इतिहास को पुनः स्थापित करने का प्रयास है।
“जब दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा देवी हो सकती है, तो बहुजन अपने नायक की पूजा क्यों न करें?”
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संकेत
कई लोककथाओं में महिषासुर को राक्षस नहीं, बल्कि संरक्षक और नायक के रूप में याद किया जाता है।
निष्कर्ष
महिषासुर सिर्फ़ एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि बहुजन समाज के लिए संघर्ष, शहादत और आत्मसम्मान का प्रतीक हैं। उनकी स्मृति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि इतिहास किन दृष्टिकोणों से लिखा गया और किसकी आवाज़ दबा दी गई।
आज जब बहुजन समाज महिषासुर शहादत दिवस मनाता है, तो यह न्याय, समानता और पहचान की लड़ाई का प्रतीक बन जाता है।
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