खान सर और मोहन भागवत सवाल व्यक्तियों का नहीं, व्यवस्था और समानता का है भारत में सुरक्षा केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह राज्य और नागरिकों के बीच विश्वास का भी प्रश्न है। जब किसी व्यक्ति को विशेष सुरक्षा प्रदान की जाती है, तो सरकार और सुरक्षा एजेंसियां इसका आधार संभावित खतरे को बताती हैं। लेकिन लोकतंत्र में केवल निर्णय ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि उस निर्णय की पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यहीं से एक महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है—क्या सुरक्षा व्यवस्था के मानदंड सभी नागरिकों के लिए समान हैं? हाल के दिनों में दो नाम चर्चा के केंद्र में रहे हैं— मोहन भागवत और खान सर । दोनों की भूमिकाएं अलग हैं, कार्यक्षेत्र अलग हैं, विचारधाराएं अलग हैं, लेकिन सुरक्षा को लेकर उठे प्रश्न एक समान हैं। मोहन भागवत और Z+ सुरक्षा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख...
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