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चुनाव आयोग पर 14 लिखित आपत्तियाँ और 16 बड़े सवाल: क्या है पूरा मामला?

14 लिखित आपत्तियाँ, 16 बड़े सवाल: चुनाव आयोग से जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग कलम की आवाज़ | विशेष लेख भारत में चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं हैं। मतदाता सूची, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा लोकतंत्र की बुनियादी शर्तें हैं। ऐसे में जब चुनाव आयोग के भीतर से ही महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को लेकर सवाल सामने आएं, तो उनका स्पष्ट जवाब मिलना जरूरी हो जाता है। 23 सितंबर 2026 को The Indian Express की एक विस्तृत जांच में बताया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार लिखित आपत्तियाँ दर्ज कीं। मुख्य सवाल: क्या इन लिखित आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई और संबंधित रिकॉर्ड जनता के सामने रखे जाएंगे? सवाल सिर्फ 14 आपत्तियों का नहीं है रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण, access और सुरक्षा को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने यह सवाल उठाया कि मतदाता डेटाबेस में बदलाव ...

खान सर और मोहन भागवत: सुरक्षा के मानदंडों पर उठते सवाल

खान सर और मोहन भागवत सवाल व्यक्तियों का नहीं, व्यवस्था और समानता का है भारत में सुरक्षा केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह राज्य और नागरिकों के बीच विश्वास का भी प्रश्न है। जब किसी व्यक्ति को विशेष सुरक्षा प्रदान की जाती है, तो सरकार और सुरक्षा एजेंसियां इसका आधार संभावित खतरे को बताती हैं। लेकिन लोकतंत्र में केवल निर्णय ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि उस निर्णय की पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यहीं से एक महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है—क्या सुरक्षा व्यवस्था के मानदंड सभी नागरिकों के लिए समान हैं? हाल के दिनों में दो नाम चर्चा के केंद्र में रहे हैं— मोहन भागवत और खान सर । दोनों की भूमिकाएं अलग हैं, कार्यक्षेत्र अलग हैं, विचारधाराएं अलग हैं, लेकिन सुरक्षा को लेकर उठे प्रश्न एक समान हैं। मोहन भागवत और Z+ सुरक्षा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख...

🚨 मीडिया का सच : जनता का टूटता भरोसा

🚨मीडिया पर जनता का गुस्सा देश का मीडिया आज डेमोक्रेसी का चौथा कॉलम कम, सत्ता और पैसों का सबसे बड़ा खिलाड़ी ज्यादा दिखाई दिया है। जिस मीडिया का काम जनता की आवाज उठाया था, वही आज सच उछाल, मुद्दा भटकाने और तीखी बहसों का बाजार गढने में लगा है। 📌 गरीब की चीख ??? 📌किसानों का दर्द अन्य सुरखियाँ नहीं बनता। 📌 बेरोज़गार युवाओं की टूटी-फूटी विशिष्टताएँ दिखाई नहीं देतीं। 📌 लेकिन चौदह तक फालतू संगीत पर चीखने वाले स्टूडियो जरूर जाते हैं। आज पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा प्रश्नोत्तरी वाला नहीं, बल्कि प्रश्नोत्तरी वाला बन चुका है। सत्य से प्रश्न करने की जगह जनता को ही जानने का काम किया जा रहा है। यह सिर्फ मीडिया की गिरावट नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के विश्वास की हत्या है। जब खबर बिक जाए और सच डरने लगे तो समझ लेना देश का आम आदमी अकेला छोड़ गया है। ⚠️ मीडिया को याद रखना चाहिए — जनता सब देख रही है। विश्वास टूट गया तो कैमरे बच जाएंगे, लेकिन नैतिकता मर जाएगी। ✍️ कलम की आवाज़ #मीडियाएक्सपोज़्ड #सेवजर्नलिज्म #सचकीलड़ाई #कलामकीआवाज़

🩸 दलितों के लिए मनुवादी सोच — समाज पर लगा कलंक

यह लेख एक गंभीर सामाजिक घटना के संदर्भ में संविधान, न्याय और सामाजिक सोच पर विचार प्रस्तुत करता है। 🩸 मनुवादी सोच और समाज पर लगाया गया कलंक सर्वोच्च न्यायालय में एक अस्वीकार्य घटना दिल्ली के मयूर विहार निवासी राकेश किशोर द्वारा 6 अक्टूबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय की एक सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर जूता फेंकने की कोशिश एक गंभीर और निंदनीय कृत्य था। यह घटना सनातन धर्म से जुड़ी एक याचिका पर की गई टिप्पणी के विरोध में हुई बताई गई, जिसे उन्होंने अपमानजनक माना। घटना के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया और उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की। भारत आज भले ही डिजिटल युग में प्रवेश कर चुका हो, लेकिन सामाजिक सोच के स्तर पर कई प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं। जाति के आधार पर इंसान को कमतर समझने वाली मानसिकता, अब भी समाज के कई हिस्सों में मौजूद है। यह सोच न केवल समानता के सिद्धांत को चुनौती देती है, बल्कि मानवीय गरिमा को भी ठेस पहुँचाती है। ⚖️ संविधान ने अधिकार दिए, सोच को बदलना अब भी बाकी डॉ. भीमराव अम्ब...